जीवन कविता है ....
सोमवार, 21 मई 2012
मंगलवार, 15 मई 2012
जीवन से बड़ी तपश्चर्या नहीं .
जो सोया है वही जागेगा ..
जो भटका है वही दिशा खोजेगा
जो गिरा है वही उठेगा ...
जिंदगी से बड़ी तपश्चर्या नहीं .
जितनी शुभता है हमारे पास
उतना ईश्वर है हमारे पास .
जितनी सुंदरता है हमारे पास
उतना स्वर्ग है हमारे पास .
जिंदगी से बड़ी तपश्चर्या नहीं .
किसी न किसी नाम की खूंटी पर टांगा है हमने खुद को
आओ , अपनी बनायी खूंटियों को उखाडें
अपने मन को मुक्त उड़ान उड़ने दें
उड़ने को सारा आकाश है
पर बसने को
धूल का कण .. दीप्ति
जो सोया है वही जागेगा ..
जो भटका है वही दिशा खोजेगा
जो गिरा है वही उठेगा ...
जिंदगी से बड़ी तपश्चर्या नहीं .
जितनी शुभता है हमारे पास
उतना ईश्वर है हमारे पास .
जितनी सुंदरता है हमारे पास
उतना स्वर्ग है हमारे पास .
जिंदगी से बड़ी तपश्चर्या नहीं .
किसी न किसी नाम की खूंटी पर टांगा है हमने खुद को
आओ , अपनी बनायी खूंटियों को उखाडें
अपने मन को मुक्त उड़ान उड़ने दें
उड़ने को सारा आकाश है
पर बसने को
धूल का कण .. दीप्ति
शनिवार, 12 मई 2012
मंगलवार, 8 मई 2012
सन्यासियों-साधकों की चलती–फिरती पाठशाला : जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि
रक्त और मांस के तकाजों का उन पर कोई असर नहीं दिखता । सिर
से पांव तक वे आत्मा की ज्योति से परिपूर्ण हैं । आनंद, पवित्रता और पुण्य की प्रभा उन्हें घेरे रहती है ।
दिन-रात परमार्थ- चिन्तन में निरत रहते सांसारिक सुख-समृद्धि, यहां
तक कि सुयश का भी उनके सामने कोई मूल्य नहीं है |
हिंदू
धर्म में जो गहराई और माधुर्य है स्वामी जी उसकी जीवंत अभिव्यक्ति हैं | एक ऐसी गंगा
जो वैयक्तिक समाधि के कमंडलु में बंद है |
उन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा अन्य धर्मों को पछाड़कर नहीं, प्रत्युत उन्हें अपना बनाकर की। हिन्दुत्व, इस्लाम और ईसाइयत पर उनकी श्रद्धा एक समान है । भारत के सनातन ज्ञान को प्राप्त कर उन्होंने साधना से उस परम सत्य को जाना जो सारे विश्व में एक ही है |
उन्होंने हिन्दुत्व की रक्षा अन्य धर्मों को पछाड़कर नहीं, प्रत्युत उन्हें अपना बनाकर की। हिन्दुत्व, इस्लाम और ईसाइयत पर उनकी श्रद्धा एक समान है । भारत के सनातन ज्ञान को प्राप्त कर उन्होंने साधना से उस परम सत्य को जाना जो सारे विश्व में एक ही है |
सनातन
परंपरा की साक्षात् मूर्ति स्वामी अवधेशानंद गिरि ने विश्व भ्रमण कर भारत के सनातन
मूल्यो की प्रतिस्थापना की | अपने आचरण से भारत और भारतीयता के सनातन
मूल्यों की स्थापना करने वाले स्वामी जी नागासन्यासियों के आचार्य महामंडलेश्वर हैं ।
सोमवार, 2 अप्रैल 2012
आज मुंबई आकाशवाणी से प्रसारित मेरी तीन रचनाएं
बहुत व्यवधान है , बचा लो 'तुम';
मत बांधो कारा में , पीड़ा होती है ;
आकान्क्षिनी हूँ ..मुक्ति की
तभी तो आती हूँ पास तुम्हारे ;
परन्तु
लाज से घिर जाती हूँ
एक निःशब्द मौन घेर लेता है मुझे
जबकि मैं जानती हूँ
मेरे जीवन की श्रेष्ठतम निधि हो तुम ;
तुम विराट हो विशाल हो
अनंत सर्वशक्तिमान हो
सारे ऐश्वर्यों से पूर्ण हो
लेकिन मेरे साम्राज्य में तो जीर्ण शीर्ण है सब
जिसे मैं फेंक नही पाती।
मेरी कलुषता को हटा दो
घृणा है मुझे
इस कालुष्य से
फिरभी घेरे है मुझे
क्योंकि प्यार है मुझे
प्रवंचनाओं और असफलताओं से
भरे इस जीवन से
जब भी हे सर्वेश्वर !
तुम्हारे पास कल्याण की कामना से आती हूँ तो
डर जाती हूँ
क्योंकि
बहुत व्यवधान है ॥ २७.०१.१९९४
**************************************
देखो देखो
प्रकाश नाच रहा है
मेरे प्राणों का प्रकाश!
सभी मगन हैं
धरती आकाश वायु सव डोल रहे हैं
देखो वह आकाश फट पड़ना चाहता है
आकाश की उस स्वर्णिम आभा को देखो
सैकडो निर्झर बहे जा रहे हैं
हे मेरे अनंत तेजस्वी परम ज्ञान !
मेरा अन्तिम गीत सुनो
वैराग्य हट जाएगा
इसके स्वरों में मेरा आनंद भरा है
देखो हे महा विराट!
मेरे नेत्रों से झरता यह पानी
अपना सर्वस्व लुटा देना चाहता है
हे मेरे चित्त चोर !
तुम्हारा प्रेम ही मेरे नेत्रों से बहकर
इस सृष्टि का अमृत सिंचन कर रहा है
मेरे प्रभु ! मेरा मस्तक तुम्हारे चरणों को छू रहा है
तुम्हारा प्रेम मेरे रोम रोम में समां गया है
मेरी वाणी से फूट रहा है
आओ मेरे प्रेम घन !
देखो मेरे प्राणों का प्रकाश नाच रहा है॥ १.४.१९९५
*************************************
अब मौन मत रहो
मेरे सारे तार ढीले हुए जा रहे हैं
तुम उन्हें आकर कस दो
और
अपना स्वर छेड़ दो
अपने इस निर्लज्ज भक्त को मत छोड़ो
मेरे निमंत्रण को स्वीकारो प्रभु !
अपनी दृढ़ शक्ति से
मेरी दुर्बलताओं को नष्ट करदो
तुम मुझे विवेक दो कि
तुम्हारे दिए सुखा को वरदान मानू
दुख को चुनौती बना जी सकूँ
तुम अपनी भक्ति कि शक्ति दो
जिससे मेरे कर्म सफल हो सकें
मेरे हर कृत्य में तुम्हारी भीनी सुगंध हो ;
हे विभो!
तुम्हारे बनाये किसी प्राणी को क्षुद्र न समझूँ
लेकिन किसी निष्ठुर के आगे सर न झुकाऊं
मुझे शक्ति दो कि
मैं अपनी क्षुद्रताओं का त्याग कर सकूँ
तुम्हारे पाद पद्मों में अपने मस्तक को झुकाए
तुम्हारा नाम स्मरण कर सकूँ
मेरे सर्वस्व
अब मौन मत रहो
छेड दो अपनी वीणा के तार को
जो अब तक तुम्हारी प्रतीक्षा में ढीले पड़े हैं..... २४ जुलाई १९९५
मत बांधो कारा में , पीड़ा होती है ;
आकान्क्षिनी हूँ ..मुक्ति की
तभी तो आती हूँ पास तुम्हारे ;
परन्तु
लाज से घिर जाती हूँ
एक निःशब्द मौन घेर लेता है मुझे
जबकि मैं जानती हूँ
मेरे जीवन की श्रेष्ठतम निधि हो तुम ;
तुम विराट हो विशाल हो
अनंत सर्वशक्तिमान हो
सारे ऐश्वर्यों से पूर्ण हो
लेकिन मेरे साम्राज्य में तो जीर्ण शीर्ण है सब
जिसे मैं फेंक नही पाती।
मेरी कलुषता को हटा दो
घृणा है मुझे
इस कालुष्य से
फिरभी घेरे है मुझे
क्योंकि प्यार है मुझे
प्रवंचनाओं और असफलताओं से
भरे इस जीवन से
जब भी हे सर्वेश्वर !
तुम्हारे पास कल्याण की कामना से आती हूँ तो
डर जाती हूँ
क्योंकि
बहुत व्यवधान है ॥ २७.०१.१९९४
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देखो देखो
प्रकाश नाच रहा है
मेरे प्राणों का प्रकाश!
सभी मगन हैं
धरती आकाश वायु सव डोल रहे हैं
देखो वह आकाश फट पड़ना चाहता है
आकाश की उस स्वर्णिम आभा को देखो
सैकडो निर्झर बहे जा रहे हैं
हे मेरे अनंत तेजस्वी परम ज्ञान !
मेरा अन्तिम गीत सुनो
वैराग्य हट जाएगा
इसके स्वरों में मेरा आनंद भरा है
देखो हे महा विराट!
मेरे नेत्रों से झरता यह पानी
अपना सर्वस्व लुटा देना चाहता है
हे मेरे चित्त चोर !
तुम्हारा प्रेम ही मेरे नेत्रों से बहकर
इस सृष्टि का अमृत सिंचन कर रहा है
मेरे प्रभु ! मेरा मस्तक तुम्हारे चरणों को छू रहा है
तुम्हारा प्रेम मेरे रोम रोम में समां गया है
मेरी वाणी से फूट रहा है
आओ मेरे प्रेम घन !
देखो मेरे प्राणों का प्रकाश नाच रहा है॥ १.४.१९९५
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अब मौन मत रहो
मेरे सारे तार ढीले हुए जा रहे हैं
तुम उन्हें आकर कस दो
और
अपना स्वर छेड़ दो
अपने इस निर्लज्ज भक्त को मत छोड़ो
मेरे निमंत्रण को स्वीकारो प्रभु !
अपनी दृढ़ शक्ति से
मेरी दुर्बलताओं को नष्ट करदो
तुम मुझे विवेक दो कि
तुम्हारे दिए सुखा को वरदान मानू
दुख को चुनौती बना जी सकूँ
तुम अपनी भक्ति कि शक्ति दो
जिससे मेरे कर्म सफल हो सकें
मेरे हर कृत्य में तुम्हारी भीनी सुगंध हो ;
हे विभो!
तुम्हारे बनाये किसी प्राणी को क्षुद्र न समझूँ
लेकिन किसी निष्ठुर के आगे सर न झुकाऊं
मुझे शक्ति दो कि
मैं अपनी क्षुद्रताओं का त्याग कर सकूँ
तुम्हारे पाद पद्मों में अपने मस्तक को झुकाए
तुम्हारा नाम स्मरण कर सकूँ
मेरे सर्वस्व
अब मौन मत रहो
छेड दो अपनी वीणा के तार को
जो अब तक तुम्हारी प्रतीक्षा में ढीले पड़े हैं..... २४ जुलाई १९९५
शनिवार, 3 मार्च 2012
पुरुष के व्यामोह से मुक्ति ही स्त्री मुक्ति है
जब जब पुरुष मोह से मुक्त हो मैंने दुनिया को देखा मुझे पहले से ज्यादा खूबसूरत नज़र आई । हर बार लगा की स्त्री को बेड़ियों में जकड़ने की साजिश किस लिए ? सिर्फ इस लिए की पुरुष सृष्टि के आरम्भ से जानता है की मुझे अपने कार्यों को अगर साधना है ,,, पूरा करना है ,,, अपनी सत्ता को बनाये रखना है तो मुझे स्त्री की अनंत शक्ति को स्वीकारना होगा । ब्रह्मा ने ब्रह्माणी से , विष्णु ने लक्ष्मी से और रूद्र ने रुद्रानी के माध्यम से ही अपनी अपनी सत्ता का विस्तार किया ।
वैदिक काल में स्त्री को कुम्भा कहा गया ? सारा सम्मान सिर्फ संतान उत्पत्ति से जुड़ गया । .... उपनिषद ने उसकी सत्ता और शक्ति को स्वीकार उसे स्त्री और पुरुष के तथाकथित लिंगभेद से मुक्त किया । ..
.... आज के भारत की सोच तुलसी की सोच है । जिसमे एक ग्रंथि है ।
स्त्री ने वासना को नकारा है । रत्नावली उसी का उदाहरण है । स्त्री ने पुरुष के व्यक्तित्व को रूपांतरित कर अपने संयम और सामर्थ्य का लोहा मनवाया है .... रत्नावली उसका भी उदाहरण हैं ।
हम उसी समाज में रहते हैं जो स्त्री को देवी , पूज्या, जैसे सम्मान सूचक शब्द देता है । पर उसे अपनी वासना पूर्ती के लिए कोठे पर भी बैठता है ।
अजीब हास्यास्पद स्थिति है ..... लोग अभी भी इस से मुक्त नहीं हुए हैं ..कि... स्त्री सुरक्षित है पिता , भाई , पति , पुत्र के संरक्षण में । एशिया का समाज अभी तक नहीं समझ पाता कि स्त्री सुरक्षित है तो अपनी वजह से । स्त्री सुरक्षित है पुरुष के मोह से मुक्त हो कर । स्त्री सुरक्षित है अपनी बनायी मान्यताओं में ... और फिर उन मान्यताओं कि जकड से बाहर निकल कर ।
पुरुष के व्यामोह से मुक्ति ही स्त्री मुक्ति है । इस मोह का परिणाम ही कन्या भ्रूण हत्या हैं ।
भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की
समरसता ही सम्बन्ध बनी अधिकार और अधिकारी की ।
समरसता और समानानुभूति ही स्वस्थ समाज का निर्माण करती है ।
वैदिक काल में स्त्री को कुम्भा कहा गया ? सारा सम्मान सिर्फ संतान उत्पत्ति से जुड़ गया । .... उपनिषद ने उसकी सत्ता और शक्ति को स्वीकार उसे स्त्री और पुरुष के तथाकथित लिंगभेद से मुक्त किया । ..
.... आज के भारत की सोच तुलसी की सोच है । जिसमे एक ग्रंथि है ।
स्त्री ने वासना को नकारा है । रत्नावली उसी का उदाहरण है । स्त्री ने पुरुष के व्यक्तित्व को रूपांतरित कर अपने संयम और सामर्थ्य का लोहा मनवाया है .... रत्नावली उसका भी उदाहरण हैं ।
हम उसी समाज में रहते हैं जो स्त्री को देवी , पूज्या, जैसे सम्मान सूचक शब्द देता है । पर उसे अपनी वासना पूर्ती के लिए कोठे पर भी बैठता है ।
अजीब हास्यास्पद स्थिति है ..... लोग अभी भी इस से मुक्त नहीं हुए हैं ..कि... स्त्री सुरक्षित है पिता , भाई , पति , पुत्र के संरक्षण में । एशिया का समाज अभी तक नहीं समझ पाता कि स्त्री सुरक्षित है तो अपनी वजह से । स्त्री सुरक्षित है पुरुष के मोह से मुक्त हो कर । स्त्री सुरक्षित है अपनी बनायी मान्यताओं में ... और फिर उन मान्यताओं कि जकड से बाहर निकल कर ।
पुरुष के व्यामोह से मुक्ति ही स्त्री मुक्ति है । इस मोह का परिणाम ही कन्या भ्रूण हत्या हैं ।
भूल गए पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की
समरसता ही सम्बन्ध बनी अधिकार और अधिकारी की ।
समरसता और समानानुभूति ही स्वस्थ समाज का निर्माण करती है ।
शुक्रवार, 24 फरवरी 2012
जीवन सुन्दर है !
जब देख न पाओ लोगो के दर्द को
बहरा कौन ....
जब सुन न पाओ न्याय के लिए उठी आवाज
गूँगा कौन ....
जब आन्तरिक सत्य को कह न सको
अक्षम कौन ....
जो ताकत का उपयोग भलाई में न कर सके
लंगड़ा कौन.....
जब किसी के अधिकारों के लिए खड़े न हो सको
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